Monday, 26 July 2010

सावन आया रे

सावन की फैली हरियाली
झूमे हर डाली मतवाली
बचपन की याद दिलाती
आँखें फिर भर-भर आतीं
जब छायें घनघोर घटायें
झम-झम बारिश हो जाये
हवा के ठंडे झोंके आते थे
सब आँगन में जुट जाते थे
गर्जन जब हो बादल से
हम अन्दर भागें पागल से
पानी जब कहीं भर जाये
तो कागज की नाव बहायें
मौसम का जादू छा जाये
कण-कण मोहित हो जाये
गुलपेंचे का रूप बिखरता
हरसिंगार जहाँ महकता
एक नीम का पेड़ वहाँ था
और जहाँ पड़ा झूला था
झगड़े जिस पर होते थे
पर साहस ना खोते थे
पहल बैठने पे होती थी
और बेईमानी भी होती थी
जब गिर पड़ते थे रोते थे
दूसरे को धक्का देते थे
माँ तब आती थी घबरायी
और होती थी कान खिंचाई.

5 comments:

  1. बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना .....आभार

    ReplyDelete
  2. सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत आभार.

    ReplyDelete
  3. संजय जी एवं सहसपुरिया जी,
    आप लोगों को रचना पसंद आई इसके लिये मेरा हार्दिक धन्यबाद स्वीकार करें.

    ReplyDelete