Saturday, 28 January 2012
संध्या बेला
Wednesday, 3 November 2010
मानव-दीप
कितने तरह के दिये
बनाये जाते हैं
जलाये जाते हैं,
बुझाये जाते हैं
और हम मानव भी
मिट्टी के नये दिये की तरह
हाड़-मांस के पुतलों के
आकार में
धरती पर आते हैं
जलते हैं, टिमटिमाते हैं
कभी-कभी साथ मिलकर
खास अवसरों पर
दीपावली की तरह ही
हँसते हैं
रोते हैं
जगमगाते हैं
परेशानियों, मुसीबतों और
दुखों के थपेड़े खाकर भी
जलते रहते हैं
अच्छे बुरे कर्मों को कर
प्रकाश फैलाते हैं
फिर जीवन की लौ के बुझते
उन्ही मिट्टी के दियों से
गल जाते हैं
और मिट्टी में मिल जाते हैं.
क्या करूँ..
एक दिये की तरह जलती-बुझती सूरत हूँ
लोगों की आँखों में सवाल उठते हैं अक्सर
खुद भी हैरत में हूँ एक हड़बड़ी की मूरत हूँ.
सुबह होते ही सूरज की आँखें चढ़ जाती हैं
हर किसी को अपने काम की पड़ जाती है
कहाँ से काम हों शुरू कहाँ पे होंगें खतम
सोचते हुए ही जिन्दगी तमाम हो जाती है.
घबराहट में जब हाथ से चीज़ छूट जाती है
तो दिल की धड़कन भी अक्सर बढ़ जाती है
याददाश्त को भी कभी मार जाता है लकवा
तो सब्जी में दोबारा और मिर्च पड़ जाती है.
इंसान काम करते-करते निढाल हो जाता है
थकान और भूख से बड़ा बुरा हाल हो जाता है
खाना होते हुए भी कभी खाने का समय ढूँढो
हड़बड़ी में हर काम भी एक ववाल हो जाता है.
Thursday, 9 September 2010
बिजली की महिमा
अंदेशा होने लगता है दिल धक-धक होता है
अंधेरों से इंसा ने समझौता न किया अब तक
बिजली की वेवफाई से बड़ा बुरा हाल होता है
असली झटका लगता है जब ये नहीं होती है
फिर इसके लौटने का सबको इंतज़ार होता है
बिखरी होती है आसमां पे रोशनी सितारों की
जमीं पे बिन बिजली के कष्ट बहुत होता है
रुतबा है इसका और जुल्म भी कर जाती है
अक्सर ही बिन इसके अँधेरों से साथ होता है
मजबूर कर दिया है इसने इतना पब्लिक को
कि अब रो-रोकर काम मोमबत्ती से होता है
बे-इन्तहां कर दी बिजली वालों ने अब इतनी
लोग कब सोयें या जागें उन्हें ना पता होता है
आदत पड़ी हुई है इसकी सभी को इतनी बुरी
कोई माडर्न टेकनोलोजी का काम नहीं होता है
कहती रहती है अलविदा अब अक्सर बेरहम
इंटरनेट कब होगा या नहीं ना ये पता होता है.
Tuesday, 7 September 2010
दूर घाटी में
कोई निर्झरा
शून्य नीलाकाश को निरख रही
है चुप धरा
मुस्कुराती वादियाँ खिली-खिली
सी धूप में
स्वप्नमयी हो उठी हैं खोयी
अपने रूप में
ढल रहा है दिन मगर इन्हें तो
होश ही नहीं
श्रंग झिलमिला उठे हैं रश्मियाँ
बिखर गईं
भाग रही धूप घिर रही है
साँझ भी घनी
नीरवता व्याप्त जैसे हो
युगों की बंदिनी
आँचल है फैल रहा धरती पे
छाँव का
पूछ रही रेशमी सी धूप पता
गाँव का
काँपती सी दिख रही हैं पंक्तियाँ
चिनार की
यह झरे से फूल कह रहे कहानी
हार की
मादकता फैल रही फूलों की
महक से
शांत है समीर हो रहे विहंग
स्तब्ध से
झाँक रहा है विजन में व्योम भी
भरा-भरा
दूर घाटी में मचल रही है कोई
निर्झरा.
ऐसे ही जायेंगे
ना हाथ में है कुछ ऐसा जो दुनिया को दे जायेंगें
कुछ बक्त बिताने को ही एक मेहमां से आये हैं
यादों के कुछ लम्हे देकर फिर रुखसत हो जायेंगे
फैलाते हैं खुशबू को फूल खिलें जो डाली-डाली
बिन मांगे कुछ दुनिया से वो भी मुरझा जायेंगे
पर कुछ लोग दिखाते अहंकार ये नादानी उनकी
टेंशन लेते नहीं किसी से वो टेंशन देकर जायेंगे
नया जमाना नये लोग हैं नयी सोहबतें हैं उनकी
आने वाली पीढ़ी को कुछ और पंख लग जायेंगे
बड़े चतुर हैं लोग ना सोचें कौन मरे या जिये यहाँ
अपना उल्लू सीधा कर ये लोग तिड़ी हो जायेंगे
ढोंगी, भोगी, जोगी जो हैं सब मतलब के साथी
वतन को ये जाने के पहले ही चौपट कर जायेंगे
बेटी की करने को शादी या घर के खर्च उठाने को
कुछ लोग ले रहे हैं कर्जा वो उसमें ही मर जायेंगे
गंदे नालों के पास घरों में इंसा रहते हैं चिथड़ों में
बदबू में जो जीते आये वो उसमें ही सड़ जायेंगे
नेता जी बैठे हैं घर में कहते हैं वो बीमार बहुत हैं
पैसे अगर सुँघाओ तो खटिया पर लात जमायेंगे
सांवरे सलोने कान्हा
अब सुख-दुख हमारा सब तेरे ही हवाले.
यशोदा के लाल और बृज के नंदलाला
छिपे कहाँ पे तुम कान्हा सांवले सलोने
दिनभर घूमते सभी गोपियों को छेड़ते
माखन चुराके खाओ फिर लगते हो रोने
मैया मरोड़े कान जब जिद तुम करते
रूठ जाते और फिर रोकर भी सताते हो
तुम हो बड़े नटखट भाग जाते झट-पट
हठ करते और फिर भोले बन जाते हो
बंशी को बजाकर तुम सबको लुभाते हो
सबके ही मन में तुम बसे हो नंदलाला
बड़े चितचोर हो तुम देखो उन्हें छुपकर
गायों को चराने जायें झूमें सभी ग्वाला
जब गोपियों संग नाचो बरखा-फुहार में
उड़-उड़ लिपटे तुमसे राधा की चुनरिया
बृज की बालायें आयें नदिया के तट पर
मतवाली सी सभी तुझे घेरतीं सांवरिया
ओ, मुरली वाले सब भक्तों के रखवाले
अब सुख-दुख हमारा सब तेरे ही हवाले.
चाँद तुम चाँदनी मैं तेरी
तुम धड़कनों में आकर बसे हो मेरी
चाँद तुम हो मेरे चाँदनी मैं तेरी.
आसमा पे हो तुम मैं हूँ कदमो तले
मैं भटकती यहाँ तू वहाँ पे जले
महफ़िलें सजी है तारों की वहाँ
हैरान सा है हर नजारा जहाँ
तन्हाइयों का दामन है फैला हुआ
साज तुम हो मैं रागिनी हूँ तेरी
जमीं आसमा का फरक है तो क्या
तुम धड़कनों में आकर बसे हो मेरी
चाँद तुम हो मेरे चाँदनी मैं तेरी.
अजनबी रास्तों पे कदम के निशां
मंजिलों की तरफ बढ़ रहे परेशां
अकेले ना तुम जा सकोगे कहीं
रात की शबनमी पलकों पे गिरा
दामन सा मैं तुमने पकड़ा सिरा
तुम मेरे हमकदम मैं हूँ साया तेरी
जमीं आसमा का फरक है तो क्या
तुम धड़कनों में आकर बसे हो मेरी
चाँद तुम हो मेरे चाँदनी मैं तेरी.
सावन की विदाई
हवा का मचलना
तितलियों का उड़ना भंवरों का गुंजन
पल-पल क्षितिज में
सिमटती है लाली
नीरवता भरता है खगकुल का कुंजन
राग अपना सुनाते हैं
झींगुर कहीं पर
आती है सांवली संझा कुछ लजाकर
और आँगन में
मदमाती है रातरानी
हवा में खुशबू छा जाती है बिखरकर
बरसने के पहले
गगन पर उमड़ती
उन काली घटाओं का लहराता दामन
चाँदनी को छुपाये
उतरती है यामिनी
बूँदों की रिमझिम से भरता है आँगन
फूलों और पातों से
माँगता है विदाई
इठलाती बहारों का दामन पकड़ कर
भिगोकर के
मखमली चूनर धरा की
अब रो रहा सावन उससे लिपट कर.
Monday, 23 August 2010
आपे में नहीं हैं
सरे आम मुल्क में तबाही मची है
है न परवाह उनको उनकी बला से
इज्ज़त किसी की लुटी या बची है
आते नहीं हैं जिनको गिनना पहाड़े
वो पब्लिक में डाकू बने दिन दहाड़े
करते हैं पतलून पब्लिक की ढीली
और खुदके कसके बाँध रखे हैं नाड़े
करके गुनाह वह हैं खुद को छुपाते
इलज़ाम का धब्बा किसी पे लगाते
कोई आँखे उठाये या चूँ भी है करता
तो वे गीदड़ भी गुर्राके शेर बन जाते
मुँह में जपकर राम हमें उल्लू बनायें
निगाहें बचाकर तीन तेरह कर जायें
गिरगिट की तरह वे बदल लेते हैं रंग
जैसे ही उनको अपने वोट मिल जायें
सफेदपोश की असलियत नहीं दिखती
बगुला भगत की फितरत नहीं बदलती
सौ चूहे खाकर भी दिखाते हैं साफगोई
बेखबर हैं वो क्या किसी पे है गुजरती
बहानेबाजी करने को ढूँढते हैं सौ बहाने
चमचों को पड़ते हैं उनके नखरे उठाने
जल बिन उपवास में जूस को पी जाते
जेल भी जाते हैं वो तो शोहरत के बहाने.
आज़ाद देश के पंछी
आजाद होकर लोग अपने होश खो रहे हैं
आजाद वतन में जहर के बीज बो रहे हैं l
जिन्हें पता नहीं क्या फर्ज बनते उनके
वो डोर थामे मुल्क की दिन में सो रहे हैं l
तूफां में घिरे मांझी ख्वाबों को देखते हैं
कामूस में कश्ती को वो खुद डुबो रहे हैं l
जीने के लिये चाहिये जिनको सुकूं थोड़ा
सहकर मुसीबतें को वो मुर्दे से हो रहे हैं l
मजबूर हैं मजदूर जो सीने पे रखे पत्थर
मालिकों के दिल तो पत्थर के हो रहे हैं l
अपने वतन की बचाई आबरू जिन्होंने
शान उनकी लोग कालिख से धो रहे हैं l
यहाँ हर तरफ फैले हैं गुनाहों से भरे मंजर
हर दिन खुदा के नाम पर अंधेर हो रहे हैं l
न भरोसा इन्सान के इरादों का यहाँ कोई
बिन बात ही कुछ लोग यहाँ उदू हो रहे हैं l
नैतिकता की करीं थीं जिन्होनें कभी बातें
अब मकबूल होकर वही बदकार हो रहे है l
न जमाना है नेकी का न है सिफत इसकी
लूटकर खुलेआम लोग गाफिल हो रहे हैं l
वतन का मुस्तकबिल ना हुआ मुकम्मल
पर मुद्दों पर लोग लम्बी तकरीर दे रहे हैं l
ये कैसी लूटमार है ?
उस देश के नेता व सरकार को धिक्कार है
चैन ढूँढा हर जगह पर मिल गईं मुसीबतें
खुशी के पल गिने-चुने हैं दुख यहाँ हजार हैं
किसी के पास लाश दफ़नाने को पैसे नहीं
तो सज रहीं कहीं कुछ अमीरों की मजार हैं
मन का दरवाज़ा भी और मंदिर भी एक है
पर उस मंदिर में रहने वाले देवता हज़ार हैं
अस्पताल सब लग रहे बाजार जैसे हों भरे
कहीं डाक्टर तो एक है पर बीमार बेशुमार हैं
लम्बी है कतार लगी और लम्बा इंतज़ार है
नल तो बस एक वहाँ और लोग बेक़रार हैं
महलों में जो रहते माँगें जन्नत की मन्नतें
दो जून रोटी खाकर कुछ लोग खुशगवार हैं
लोग डिग्री को साथ लेकर एड़ियाँ रगड़ रहे
नौकरी है एक मगर वहाँ कई उम्मीदवार हैं
अमीरों के जश्न में कुछ कुत्ते आकर खा गये
पर बाहर खड़े भिखारियों को लगती दुत्कार हैं.
Monday, 26 July 2010
सावन आया रे
झूमे हर डाली मतवाली
बचपन की याद दिलाती
आँखें फिर भर-भर आतीं
जब छायें घनघोर घटायें
झम-झम बारिश हो जाये
हवा के ठंडे झोंके आते थे
सब आँगन में जुट जाते थे
गर्जन जब हो बादल से
हम अन्दर भागें पागल से
पानी जब कहीं भर जाये
तो कागज की नाव बहायें
मौसम का जादू छा जाये
कण-कण मोहित हो जाये
गुलपेंचे का रूप बिखरता
हरसिंगार जहाँ महकता
एक नीम का पेड़ वहाँ था
और जहाँ पड़ा झूला था
झगड़े जिस पर होते थे
पर साहस ना खोते थे
पहल बैठने पे होती थी
और बेईमानी भी होती थी
जब गिर पड़ते थे रोते थे
दूसरे को धक्का देते थे
माँ तब आती थी घबरायी
और होती थी कान खिंचाई.
जीवन का क्रम
लेकिन अब ये जीवन की संझा है
सुबह ही तो आकाश के कोने में
जब लालिमा बिखरी थी
तो यही सूरज उदित हुआ था
अपने पथ पर एक अकेला यात्री
बन कर चल पड़ा था
दिन भर अपनी ऊर्जा को बिखेरा
और उसकी रश्मियों की ऊष्मा
धरती को विभोर करती रही
कण-कण में स्फूर्ति और जीवन
की धड़कन भरती रही
और अब संझा के आगोश में
निढाल हो चुका है वही सूरज
एक लम्बी यात्रा से शिथिल होकर
काले स्याह बादलों के पीछे
उसका जर्जर अस्तिव छुप रहा है
और लालिमा प्रस्थान कर चुकी है
कल यही सूरज फिर उसी उमंग से
अपनी पूरी ऊर्जा लेकर आयेगा
अपना कर्तव्य पूरा करने
फिर शुरू होगा वही जीवन का क्रम
किरणों का धरती पर उतरकर
उसके अंग-अंग पर बिखर जाना
सूरज की ऊष्मा का स्पंदन
धरती की रग-रग में समा जाना
फिर अपने जीवन के अंतिम क्षणों को
संझा को समर्पित करके डूब जाना.
Thursday, 22 July 2010
ये दुनिया
किसी को बुरा कहकर लोग जल रहे हैं
बिन बात ही वो क्यों जहर उगल रहे हैं
सामने आकर कहने की नहीं हिम्मत
पीठ के पीछे उनके कदम मचल रहे हैं
स्मार्ट लोग अपनी चालों को दिखाकर
चुप रहने वालों पे बड़ा जुल्म कर रहे हैं
नाम और यश को रिश्बत खरीद लेती
और बेगुनाह जाकर जेलों में सड़ रहे हैं
कुछ की है हैसियत दुनिया खरीदने की
कुछ लोग रुखी-सूखी खाकर बहल रहे हैं
भोर के पहले कोई कचरा समेट जाता
कुछ लोग देर तक बिस्तर में सो रहे हैं
घर में लगी है खुश करने को बहू सबको
कुर्सी पे बैठे बाबू जी बड़-बड़ कर रहे हैं
बारिश के आने से एक नयी बहार आती
कुछ पात आँधी से धरती पर गल रहे हैं
किसी की फिकर में भलाई करो जिसकी
उसके लिये लोगों की नफरत को सह रहे हैं.
परिहास
ना रो पाई ना हँस पाई
मुझे ऐसी कड़ी बनाया क्यों
जो न जुड़ पाई न बिखर पाई....
किन अपराधों का फल है यह
किन पापों का प्रतिदान मिला
जो अनजानी सी राहों पर मुझे
मिला अमिय विष का प्याला
पथ पर से फूल उठा कर के
काँटों से पंथ सजाया क्यों
अनुराग किया फिर कंटक से
तो सुख सौरभ तू लाया क्यों
पीने का रहा बराबर क्रम
ना जी पाई ना मर पाई
कैसा है तू अबोध निर्मम
न मिलन ही दिया न विदाई दी...
मुझे क्षीर-उदधि में छोडा यदि
उत्ताल तरंगें उठायीं क्यों
था देना नहीं कूल मुझको
सागर में नाव बहायी क्यों
यदि करना था परिहास तुझे
मेरे जीवन के पग - पग में
मंजिल फिर दीघ्र बनाता ना
ना रखता तू मुझको भ्रम में
मुझ शिखा को छोडा मंझा में
न जल पाई न बुझ पाई
मुझे ऐसी कली बनाया क्यों
जो न खिल पाई न मुरझाई...
कभी रुदन दिया कभी हास्य मधुर
ना रो पाई ना हँस पाई
मुझे ऐसी कड़ी बनाया क्यों
जो न जुड़ पाई न बिखर पाई....
क्यों
रुख किया था और अपनी
चाहत का जाल बुना था
क्या वह महज
एक सपना था....
अहसास कुछ जगाये उसमे
लड़खड़ाये जब कदम तो
आगे का पता ना था
क्या वह महज
एक तड़पना था....
एक तिनका सी वह फिर
बहने लगी थी जलधार में
अपना समझ कर तुम्हें
फिर भी ना कह पाये
जो कहना था...
तुम खो चुके थे होश अपने
जज्ब हो चुके थे उसी में
उसको भी होश न रहा
क्या बस अरमान का ही
वह मचलना था....
सूरज बनकर रोशन हुये
फिर क्षितिज की तरफ
तुम बढ़ने लगे
क्यों चाहा था उसे जब
तुम्हें ढलना था....
कभी तुम टहलते थे रात में
तारों के नीचे ओंठों को भींचे
सुलगते दिल से
क्या वह सब एक
पागलपना था....
ओस में डूबी घास को कुचलना
बरसती चाँदनी में
उसके ख्यालों में डूबना
क्या था ये सब अगर
उसे भूलना था....
पार्टी का इनविटेशन
हम भी गये पार्टी में जब इनविटेशन मिला
किसी की शादी की पार्टी हो या जन्मदिन पर
हमने तो खाना बनाना बंद कर दिया घर पर
लोगों से मिलकर कुछ मन भी बहलने लगा
पर उनकी हरकतें देखकर मन डरने लगा
एक पार्टी थी कहीं किसी के जन्म दिन पर
मित्र दिल के बड़े अच्छे थे और सुन्दर था घर
रिश्तेदार और मित्रों की थी वहाँ भरमार
तो पागलों की भी संख्या थी बेशुमार
काफी लोग जो लगते थे बिलकुल नार्मल
जब पर्दा उठा तो लगी फरक कुछ शकल
उनकी बातें जब सुनीं तो लगे अटपटे
वहाँ जोगी भी खड़े थे पहने जूते फटे
एक बाबा थे वहाँ जिनकी दाढ़ी थी लम्बी
नाम था उनका पागल बाबा या फिर पी.बी.
रह-रह के खुजा रहे थे वो अपनी लम्बी दाढ़ी
और मुँह में चबा रहे थे कुछ पान सुपाड़ी
तरह-तरह के नमूने के वहाँ आये थे लोग
सबके सब जुटे थे लगाने में मिष्ठान का भोग
कई लोग तो खड़े थे अपनी ही बातों में अटके
कुछ खाने के इंतजार में लगे भटके-भटके
पकवान के थाल जैसे ही लाये गये वहाँ
तो और भी हुजूम इकठ्ठा हो गया वहाँ
आकर लाइन में लग गये एक दूजे से सटे
प्लेटें और नैपकिन सबके बीच में बंटे
कुछ ने खायी हर एक मिठाई जमकर
समोसों पे तो जमी थी सबकी ही नजर
ठूँस-ठूँस के खाया सबने जितना खा सके
फिर कुछ बैठ गये अपने पेट को पकड़ के
बाद में कुछ लोग लगने लगे थोड़े सिक
तो भीड़ भी धीरे-धीरे कम हुई तनिक
लोगों का दिल पार्टियों के लिये क्यों पागल है
सोच रही हूँ कि मुफ्त का खाना कहाँ कल है.
सजा
तोड़ते ही रहोगे
और मैं
टूटती ही रहूँगी
तुम मुझको सदा
कोसते ही रहोगे
और मैं
बिसूरती ही रहूँगी
अपनी तपिश में
जिऊँगी सदा
और फिर
जीकर झुलसती रहूँगी
घावों को छुपाकर
ज़माने से
मरहम के लिये
बस तरसती ही रहूँगी.
एक दिन जब मैं
ना रहूँगी
तो शायद तुम्हें
कुछ अहसास होगा
यदि तुम्हारी आँखें
ढूँढेंगी मुझे
तो यादों के धागों
से ही साथ होगा.
तुम्हारे उन आँसुओं के
बहने का
मेरे लिये तब
कोई सार न होगा
ख्वाहिश, खुशियों और
गम से परे
मेरे लिए कहीं दूर
एक नया संसार होगा.
जब आँख फड़की
दायीं आँख की खिड़की
तो वो जोर-जोर से फड़की
मन को होने लगा बड़ा खटका
घंटों को रहा भटका-भटका
हो रहा था बड़ा अंदेशा
कहाँ से मिलेगा बुरा संदेशा
कुछ देर बाद एक खबर आई
तो मैं बहुत ही घबराई
एक दोस्त ने बताया की मैंने
आज उसकी जान बचायी
मैंने पूछा की वो कैसे भाई
बोला, '' दीदी, आपकी दुआ रंग लाई
जा रहा था आफिस को बस
गया मैं ट्रैफिक में फंस
आ रही थी बहुत झुंझलाहट
वाहन जा रहे थे घिसट-घिसट
हार्न का शोर और लोगों में खट-पट
लोग गुस्से में देखते हैं पलट-पलट
काम के लिये मैं हो रहा था लेट
कुछ लोग नहीं करते हैं इंडीकेट
ऐसे ही एक ट्रक सामने आया
उसका मूव मैं समझ न पाया
ब्रेक लगाने में कुछ टाइम लगा
हड़बड़ी में वो भी दे गया दगा
अचानक एक ट्रक ने मारी टक्कर
साइकिल संग गिरा मैं दूर उछल कर
मेरा सर एक स्थिर ट्रक से टकराया
हेलमेट ने तो सर को बचाया
पर जिसकी बहना का हो ऐसा प्रताप
उस भाई को क्या हो संताप
और आपकी दुआ मौत से खींच लाई. ''
तो सुनकर मैं बहुत सकुचाई
मैंने कहा, '' मेरे प्यारे भाई
मैंने कहाँ तुम्हारी जान बचाई
उस ऊपर वाले की है सब दुहाई
वही सबकी करता है भलाई
उसकी दया से तुम सलामत हो
अपने वीवी बच्चों की अमानत हो
तुम्हारी जान बची बहुत गनीमत है
तुम्हारी फेसबुक पर बहुत कीमत है
आज मौत को तुमने दुत्कार दिया
और हम लोगों पर उपकार किया
तुम मुझे प्यार से देते हो सम्मान
इतना तो रहता है मुझको ध्यान
मैं तो हूँ एक मामूली सी इंसान
रक्षा करने वाला तो है भगवान
तुम ऐसे ही हँसते-मुस्कुराते रहो
और ऊपर वाले के गुन गाते रहो.''