है उतर गगन
से तू आती
जब चंदा की
खुलती मधुशाला
खो देता होश
तिमिर अपना
तेरे नयनों की
पीकर हाला.
करके कटाक्ष
इठलाती रहती
ओ, फूलों सी
कोमल उज्ज्वला
तम से खेले
तू आँखमिचौली
फिर छिप कहीं
जाती है चपला.
फैलाये तू अपना
मधुर हास्य
तुझमें ना कुछ
है अंतर आया
ओ, सुहासिनी
अब बता जरा
है कहाँ से
चिर यौवन पाया.